September 27, 2022

HACKED BY AYYILDIZ TIM

HACKED BY AYYILDIZ TIM Yıldırım Orduları Birim Komutanlığı

नष्ट हो रहे पर्वत पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः स्थापित किया जा सकता है?

डॉ. जियाउल हक, 22 अगस्त | पर्वत हमारे पारिस्थितिक तंत्र के प्रमुख घटक हैं, जिसके बिना हमारे पारिस्थितिक तंत्र अधूरा है. पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र में पहाड़ी क्षेत्रों में जीने वाले या रहने वाले जटिल जीवित जीव हैं. पर्वत, दुनिया के लगभग 27% भूमि की सतह को ढंके हुए हैं और, दुनिया की लगभग 22% आबादी के जीवन का समर्थन करते हैं जिसमें पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले सभी लोग भी हैं.

पर्वत हमारे पारिस्थितिक तंत्र को कई तरीकों से मदद करते हैं. निचले इलाकों में रहने वाले लोग कई तरह के सामानों और सामग्रियों जैसे पानी, लकड़ी, ऊर्जा, जैव विविधता की सुरक्षा और कई अन्य चीजों के लिए पहाड़ी क्षेत्रों पर निर्भर रहते हैं. आधी मानव जाति को पर्वतों से ताजा पानी मिल रहा है. ये मीठे पानी का प्रमुख स्रोत हैं इसलिए, ये हमारे पारिस्थितिक तंत्रों के लिए जरूरी हैं क्योंकि ये पृथ्वी की सतह पर मौजूद सभी जीवित प्राणियों के लिए पानी के दुर्ग के रूप में काम करते हैं.

पर्वतों पर मौजूद विशाल जैव विविधता दुनिया भर के पर्यावरण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इतना ही नहीं, पर्वत पारिस्थितिक तंत्र की अखंडता को बनाए रखते हैं. हम सभी जानते हैं कि बढ़ती आबादी और हानिकारक मानव गतिविधियों से, हमने पारिस्थितिक तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा पैदा किया है.

विकास पहलों और पर्यटन के ऋणात्मक प्रभाव से पर्वत पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः स्थापित किया जा सकता है?

पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत नाजुक एवं संवेदन शील होते हैं. ये प्रायः मानवीय हस्तक्षेप से दूर रहते हैं, और यदि इनमें निम्न स्तर पर भी मानवीय हस्तक्षेप किया जाए तो ये पारिस्थितिकी तंत्र अन्य तंत्रो की अपेक्षा शीघ्र ही अवक्रमित हो जाते हैं.

बढ़ती हुई जनसंख्या, आवास प्राप्ति, खनिजों की प्राप्ति, सड़क मार्गों का निर्माण, अवैज्ञानिक आवासीय परियोजनाएं, अपशिष्ट प्रबंधन की अधारणीय तरीको, पर्यटन की अधारणीय तौर तरीकों, ग्रीन हाउस गैसों का पर्वतीय क्षेत्रों में अत्यधिक उत्सर्जन आदि से पारिस्थितिक तंत्र को अधिक क्षति पहुँचा है.

इस क्षति को निम्नलिखित तरीकों से पुनः स्थापित किया जा सकता हैं

• पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र की वहन क्षमता के अनुरूप विकासात्मक गतिविधियों की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए जिससे दोहन पर अंकुश लगाया जा सकता है.

• किसी भी परियोजना को अनुमति या प्रारम्भ करने से पूर्व पर्यावर्णीय प्रभाव का मूल्यांकन करना चाहिए जिससे अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि इस परियोजना से पर्यावरण को कितना लाभ एवं हानि हो सकती है. ये प्रकिया अपनाना बेहद जरूरी है.

• धारणीय विकास के घटकों का पूर्ण रूप से अनुपालन किया जाना चाहिए.

• स्थानीय जनसमूह के साथ मिलकर इस चुनौतियों से निपटने के लिए रणनीति बनाकर एक जुट हो कर कार्य करना चाहिए.

• धारणीय पर्यटन तथा पारिस्थितिक पर्यटन के अनुरूप ही संस्कृति पर्यटन का विकास करना होगा.

• ग्रीन टेक्स जैसी अवधारणायें जो विकृत पारिस्थितिक तंत्र को पुनः स्थापित करने में धन की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगी.

• स्वस्थानी संरक्षण तकनीकों पर प्रमुखता से बल देना चाहिए.

ये सारे प्रयास किये जाते हैं तो पर्वत पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः स्थापित किया जा सकता हैं.

जैसा कि हम सभी जानते हैं तेजी से बढ़ती जनसंख्या द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग करने के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है. इस अत्यधिक दोहन का नतीजा मृदा, जैव विविधता में कमी और भूमि, वायु और जलस्रोतों के प्रदूषण के रूप में दिखायी पड़ रहा है. अत्यधिक दोहन के कारण पर्यावरण अवक्रमण के चलते यह मानव जाति और उसकी उत्तरजीविता के लिये अनेक खतरे उत्पन्न कर रहा है.

प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र की स्थिति पर अवक्रमण पहुँच जाए तो फिर इसे पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता हैं. हांलाकि पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र अभी अपने इस अवक्रमण की स्थिति तक नहीं पहुँचा हैं.

अतः जितनी शीघ्रता से इन पारिस्थितिक तंत्र संरक्षण, अनुरक्षण कर लिया जाएगा उतना ही बेहतर भविष्य हो सकता हैं और पर्वत एक बड़ी जनसंख्या के लिए आवश्यक संसाधनों की पूर्ति लंबे समय तक कर सकता है.

पर्यावरण में पर्वत की उपस्थिति पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत जरूरी है. चूंकि ये पर्वत, मौसम प्रणाली और जल संसाधन जैसे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आवश्यक कई प्राकृतिक गतिविधियों के लिए जिम्मेदार हैं. बाढ़, भूस्खलन, आदि जैसे कई प्राकृतिक आपदाओं पर भी पर्वत नियंत्रण करते हैं.

पर्वत हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए यदि हम अपने पर्वतों को संरक्षित नहीं करेंगे, तो दुनिया भर के पर्यावरणीय मुद्दों (जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण) का खतरा समय के साथ बिगड़ता जायेगा और अंत में बाढ़, अकाल और भूस्खलन का कारण बन जाएगा.

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